क्या लोग वाकई में जानवर से भी बत्तर हो गए हैं?
एक अकेली लड़की के लिए बहार निकलना भी दुश्वार हो गया है इसीलिए नहीं कि लोग मदद नहीं कर पाते बल्कि इसीलिए की वह देखके भी अनदेखा कर देते हैं।
जहाँ फायदा उठाने की बात आती है वहां तो सड़क पर पड़ा नोट भी उठा लेते हैं लेकिन कोई मदद के लिए पुकार रहा हो तो अपना हाथ सबसे पहले खींच लेते हैं।
क्या शर्म, हया , करुणा , मानवता और संस्कार का दाह संस्कार कर दिया गया है?
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