भूख की कोई सीमा नहीं होती, गरीबी की कोई रेखा नहीं होती। जितना मिले उसमें इंसान खुश नहीं होता, सच के सामने ही तो वह है रोता

भूख लगती है तो इंसान कुछ भी कर सकता है, फिर चाहे उसे जानवर भी बनना पड़े, तब भी वह हिचकिचाता नहीं है।