नारी का अस्तित्व सिर्फ सपनों तक ही सीमित है,मुझे तो नहीं लगता

रिश्तों की अग्नि परीक्षा नारी को ही क्यों देनी पड़ती है? मुझे तो लगता है कि नारी को अपने सपनों को साकार करने के लिए खुद कदम बढ़ाने चाहिए !